Sunday, 1 February 2015

चलें…



ए जिंदगी!
चल कहीं को निकल पड़ते हैं|
बस हम अकेले, यूँही हाथ थामें,
सब पीछे छोड़कर चल पड़ते हैं!

इन हदों के उस पार कहीं,
जहाँ चाँद छुपके मिलता हो ज़मीं से,
और तारे पार्श्व में गुनगुनाते हो!

इन नियमों से परे कहीं,
जहाँ नदी अपने में खोई हुई सी बहती हो!
और उसे देखकर शिखर मुस्कुराता हो!

एक पुराना टेप रेकॉर्डर भी साथ होगा,
जिसमें तेरे सारे पसंदीदा गीत होंगे!
जब सफ़र में साथ होंगे हम,
ये गीत सुनकर गुनगुनाएँगे!

कुछ पेन और काग़ज़ साथ रख लेंगे,
तुझसे बतियाने में काम आएगा|
जब तू रूठेगी मुझसे,
काग़ज़ों पे नज़्म लिखके तुझे मना लूँगा!

चल निकल चलें यूँ कि अब,
फ़िर कभी न लौटे यहाँ!
चाहे जितना लंबा हो सफ़र अपना,
हम साथ बिता दे वहाँ!



अभिजीत

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