Sunday, 8 March 2015

मेरी भी सुनो



बहुत अफ़सोस है मुझे कि
तू बस मुझमें
भोगविलास ही देख सका।
नहीं गयी तेरी दृष्टि
उस ओर कि
जहाँ से तू नाप पाता
मेरी ऊँचाइयाँ,
देख पाता कि
एक औरत की शिराओं से,
उसके रक्त से,
उसका दूध पीकर ही तू
पा सका ये वजूद
ये शख्सियत
हँसी आती है मुझे
कि तू जिस डाली के सहारे
उतर सका इस धरती पर
उसे ही काट कर
संतुष्ट कर रहा अपना अहम्।
कहाँ याद आये तुझे वो पल
जब पिता की डाँट से बचने के लिए
तूने बड़े विश्वास से
थामी थी बहना की कलाई
और तो और
तू तो ये भी भूल गया कि
ज़िन्दगी की कशमकश में
जब जब कमजोर पड़ा तू
काँपे तेरे कदम
तब तब तुझे
सहारा देने को
आगे बढ़े जो क़दम
जिन बाँहों ने थाम कर
गिरने से बचाया तुझे,
संभाला तुझे
वो क़दम, वो हाथ
कभी एक माँ, कभी एक बहन
तो कभी एक पत्नी के थे।
कहाँ देख पाया तू
एक स्त्री में मौजूद
पन्ना को,पद्मिनी को
दुर्गावती, चाँदबीबी या लक्ष्मीबाई को।
अब बस बहुत हुआ।
बहुत आहत हुआ मेरा वजूद
बहुत तार तार हुई मेरी अस्मिता
बहुत हो गए सवाल जवाब।
मैं आज बहिष्कार करती हूँ….
तुम्हारा,
तुम्हारे इस गलीज़ समाज़ का।
छीनती हूँ वो सारे हक़ तुमसे
जो प्यार के नाते
विश्वास की डोर में
बँध कर
मैंने तुम्हें दिए।
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अभिजीत

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